जिला ब्यूरो रिपोर्ट बालाघाट
अब कवेलु फैक्ट्री के बाद जिले की राइस मिलें बंद होने की दहलीज पर

चावल प्रकरण की जांच में आखिर सच्चाई क्या ,,क्या एथेनॉल प्लांट को चावल बेचने का अधिकार था,शिकायतकर्ता कौन है, निष्पक्ष हो जांच

कार्रवाई से दूर क्यों हैं एफसीआई, नान और एथेनॉल प्लांट?
- अब कवेलु फैक्ट्री के बाद जिले की राइस मिलें बंद होने की दहलीज पर
बालाघाट। जिले का बहुचर्चित चावल प्रकरण इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। इसे लेकर कहीं 1200 करोड़ रुपये के घोटाले के दावे किए जा रहे हैं, जबकि एफसीआई की प्रारंभिक जांच में मामला लगभग 5.63 लाख रुपये का बताया गया है। आखिर सच्चाई क्या है, इसका पता निष्पक्ष और व्यापक जांच के बाद ही चल सकेगा। यदि वास्तव में इतनी बड़ी अनियमितता हुई है तो दोषियों पर कठोर कार्रवाई होना ही चाहिए।
बताया जाता है कि फोर्टिफाइड चावल को खुले बाजार में निजी कंपनियों को 3190 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेचा जाना निर्धारित था। इसके बावजूद एफसीआई द्वारा पहले एथेनॉल प्लांट को लगभग 2250 रुपये और बाद में 2320 रुपये प्रति क्विंटल की दर से समझौते के माध्यम से चावल उपलब्ध कराया गया। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इतने कम मूल्य पर चावल क्यों बेचा गया
आखिर कैसे मिला फोर्टिफाइड चावल ?
यदि एथेनॉल प्लांट को केवल पुराने सरप्लस चावल की आवश्यकता थी, तो उसे फोर्टिफाइड चावल क्यों दिया गया? इस पूरे घटनाक्रम में एफसीआई, नागरिक आपूर्ति निगम (नान) और एथेनॉल प्लांट की भूमिका की निष्पक्ष जांच होना आवश्यक है। यदि कहीं कोई अनियमितता या कमीशनखोरी हुई है तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
क्या एथेनॉल प्लांट को चावल बेचने का अधिकार था ?
चर्चा यह भी है कि एथेनॉल प्लांट ने बिना फोर्टिफाइड चावल का उपयोग किए ही एथेनॉल का उत्पादन कर लिया। यदि ऐसा है तो फिर प्राप्त फोर्टिफाइड चावल का क्या हुआ? वहीं यह भी कहा जा रहा है कि एथेनॉल प्लांट ने यही चावल राइस मिलर्स को लगभग 2800 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बेच दिया। यदि यह तथ्य सही हैं तो बड़ा प्रश्न यह है कि क्या एथेनॉल प्लांट को यह चावल व्यापारिक लाभ कमाने के लिए दिया गया था या केवल एथेनॉल उत्पादन हेतु? क्या उसे इस चावल को पुनः बेचने का वैधानिक अधिकार था?
क्या केवल खरीदारों पर कार्रवाई न्यायसंगत है?
यदि जांच का दायरा केवल कथित खरीदारों तक सीमित रहेगा और मूल जिम्मेदार पक्षों की भूमिका की अनदेखी होगी, तो इसे निष्पक्ष जांच नहीं कहा जा सकता। जिसने भी नियमों का उल्लंघन किया है, चाहे वह किसी भी संस्था या पद पर हो, उसके विरुद्ध समान रूप से कार्रवाई होना आवश्यक है। तभी यह माना जाएगा कि जांच निष्पक्ष है और उस पर किसी प्रकार की आंच नहीं है।
शिकायतकर्ता कौन है?
इस पूरे मामले में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि मूल शिकायतकर्ता कौन है और शिकायत किन तथ्यों के आधार पर दर्ज की गई। किसी राजनीतिक दल या उसके नेताओं के नाम का सहारा लेकर मामले को अलग दिशा देना या परिजनों एवं रिश्तेदारों का हवाला देकर किसी को बदनाम करना समाधान नहीं है। इससे केवल वास्तविक तथ्यों पर पर्दा पड़ने की आशंका बढ़ती है।
बेलगाम व्यवस्था और उद्योगों पर संकट
ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ अवसरवादी लोग इस पूरे प्रकरण का अपने-अपने हितों के लिए उपयोग कर रहे हैं। यदि प्रशासनिक चूक, लालफीताशाही और जवाबदेही की कमी पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका सीधा असर जिले के उद्योगों पर पड़ेगा। पहले कवेलू उद्योग प्रभावित हुए, फिर पोहा उद्योग कमजोर पड़ा और अब राइस मिलें भी बंद होने की कगार पर हैं। इसका परिणाम यह होगा कि हजारों कामगार बेरोजगार होंगे, युवा उद्यमी आर्थिक संकट में आएंगे, धान की मिलिंग प्रदेश से बाहर जाएगी और ‘धान का कटोरा’ कहलाने वाले जिले की पहचान भी कमजोर पड़ जाएगी।
जनता का विश्वास होगा मजबूत जन चर्चाओं पर तेजी
निष्पक्ष, पारदर्शी और सर्वव्यापी जांच ही इस पूरे प्रकरण की सच्चाई सामने ला सकती है। जनता की अपेक्षा है कि दोषी चाहे कोई भी हो, उसे कानून के अनुसार दंड मिले और निर्दोषों को अनावश्यक परेशान न किया जाए। तभी न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास और अधिक मजबूत होगा।













